नवरात्रि पर्व, माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना का पर्व .नारी शक्ति की उपासना की जाती है इन नौ दिन में .भक्त जन माँ के रूप में देवी की उपासना करते हैं .व्रत रखते है ,उपवास रखते हैं आराधना करते हैं और अपने कुशल क्षेम की याचना करते हैं .देवताओं ने ही अपनी सहायता के लिए माँ का आव्हान किया था और देवी माँ ने उनकी सहायता कर असुरों को पराजित कर उन्हें अभय दान दिया था .कहते हैं भगवान राम ने भी रावन वध के लिए देवी आराधना की थी और वे रावन का वध कर सके ।
इस पर्व के सहारे हम नारी शक्ति की ही तो साधना करते हैं .शक्ति के बिना शिव शव के समान हैं .यह पर्व संदेश देता है नारी के सम्मान का ,उसकी छुपी शक्ति की आराधना का ।
क्या हम सचमुच नारी का सम्मान कर पाए हैं ? समाज ने उसे उसके उचित अधिकार दिए हैं ?नारी पर होते अत्याचार ,कन्या भ्रूण हत्याएं ,दहेज़ के लिए उनकी बलि सचमुच नारी शक्ति का अपमान ही है ।
हमारी देवी आराधना तभी सफल होगी जब हम नारी समाज को उसका उचित अधिकार देंगे .उसको सम्मान की द्रष्टि से देखेंगे .नव रात्रि पर्व को हम समर्पित करें नारी के लिए ,उसके सम्मान के लिए ,हमारा यही संकल्प सही देवी उपासना होगी .तभी माँ भगवती हम सब पर प्रसन्न होगीं .
Sunday, April 5, 2009
Friday, March 20, 2009
फूटेंगे नव अंकुर
ग्रीष्म काल आता,
धरती ताप से झुलसती ,
पेड़ पौधे तीखे घाम में ,
गरम ,गरम थपेडों से ,
मुरझाये ,झुलसाये लगते .
पात विहीन डालियों संग ,
मानो अपनी व्यथा कहते .
पशु ,पक्षी बेबस हो ,
ताप की पीड़ा सहते ।
आकुल व्याकुल जन ,
छांव ,पानी को तरसते ।
हाँ ,इस भीषण गरमी में ,
किसी को सुकून है ।
शिरीष का खड़ा पेड़ ,
केशरिया फूलों से लदा,
पर वह शांत और ,
मौन है ।
निरखता ,धरती की विपदा ,
पेड़ ,पौधों को मिलती सजा ,
हाँ ,
वह धीरज बंधाता है ।
एक आस जगाता है ।
टलेगा संकट
स्थिर थोड़े ही रहता है ।
देखो मुझे ,अपना दुःख कम करो .
भविष्य के सुखद सपनों को ,
अपनी आंखों में भरो ।
यह तपन ,यह तड़पन ,
जरूर कम होगी ।
इस भीषण गरमी से ही ,
आगे ,धरती की प्यास बुझेगी ।
बिना तपे सोना ,
कहीं खरा होता है ,
छाएंगे मेघ ,वर्षा होगी ।
तुम्हारी पीड़ा ,
अपने आँचल में भर लेगी ।
सारा दुःख ,सारा संकट ,
टल जाएगा ,
धरती हरी भरी हो जायेगी ।
फूटेंगे नव अंकुर ,
तपन की पीडा ,
वर्षा की बूंदों में ,
घुल जायेगी .
धरती ताप से झुलसती ,
पेड़ पौधे तीखे घाम में ,
गरम ,गरम थपेडों से ,
मुरझाये ,झुलसाये लगते .
पात विहीन डालियों संग ,
मानो अपनी व्यथा कहते .
पशु ,पक्षी बेबस हो ,
ताप की पीड़ा सहते ।
आकुल व्याकुल जन ,
छांव ,पानी को तरसते ।
हाँ ,इस भीषण गरमी में ,
किसी को सुकून है ।
शिरीष का खड़ा पेड़ ,
केशरिया फूलों से लदा,
पर वह शांत और ,
मौन है ।
निरखता ,धरती की विपदा ,
पेड़ ,पौधों को मिलती सजा ,
हाँ ,
वह धीरज बंधाता है ।
एक आस जगाता है ।
टलेगा संकट
स्थिर थोड़े ही रहता है ।
देखो मुझे ,अपना दुःख कम करो .
भविष्य के सुखद सपनों को ,
अपनी आंखों में भरो ।
यह तपन ,यह तड़पन ,
जरूर कम होगी ।
इस भीषण गरमी से ही ,
आगे ,धरती की प्यास बुझेगी ।
बिना तपे सोना ,
कहीं खरा होता है ,
छाएंगे मेघ ,वर्षा होगी ।
तुम्हारी पीड़ा ,
अपने आँचल में भर लेगी ।
सारा दुःख ,सारा संकट ,
टल जाएगा ,
धरती हरी भरी हो जायेगी ।
फूटेंगे नव अंकुर ,
तपन की पीडा ,
वर्षा की बूंदों में ,
घुल जायेगी .
Wednesday, March 18, 2009
दोषी कौन ?
आज की तेज भागती ,दौड़ती जिन्दगी में मौत कितनी सस्ती हो गई है, इसका उदाहरण हमें आए दिन होती दुर्घटनाएं देख कर मालूम होता है .गली ,चौराहों ,सडकों पर तेज भागते लोग ,तेज भागती गाडियां मौत को दावत देतीं हैं .सड़क पर पैदल चलता आदमी भी आज सुरक्षित नहीं है .यातायात के बहुत सारे नियम ,कानून बने हुए हैं ,पर उन्हें भी अंगूठा दिखाते लोग भागते जा रहे हैं .धनी मां ,बाप अवयस्क बच्चों को गाड़ी दिला कर सड़कों पर मनो मौत की दौड़ करवा रहे हैं .सड़कों पर सर्कस करते बच्चे हर जगह देखे जा सकते हैं .लाइसेंस नहीं ,सर पर हेलमेट नहीं और कलाबाजी दिखाते ,बच्चे अनो मौत को दावत देते हों ।
हेलमेट का नियम है ,चार पहिया वाहनों के लिए बेल्ट का प्रावधान है ,गाड़ियों की गति की सीमा भी है पर किसे परवाह है इसकी .मरते हैं हमीं , दुर्घटना ग्रस्त होते हैं हमी फ़िर भी लापरवाही ?
ताबड़तोड़ होती सड़क दुर्घटनाएं ,पर हम कोई सबक नहीं लेते .जागते नहीं ,अपने को नियंत्रित नहीं कर पाते . जब दुर्घटनाएं होती हैं ,तब कानूनों को गली दी जाती है ,थानों का घिराव किया जाता है ,अस्पताल तोड़ फोड़ का शिकार होते हैं .हमें अपनी गलती स्वीकार नहीं .बार बार मौत से खेलते हैं पर हममें को सुधार नहीं ।
सिलसिला मनो यूँ ही चलता रहेगा .हम नहीं सुधरेंगे ,हमने ठान रखा है .कानून कायदे शायद बनाये ही जाते हैं तोड़ने के लिए .फ़िर होने दीजिये मौत ,इतना हो हल्ला किसलिए .पुलिस दोषी क्यों ? कानून दोषी क्यों ?
दोषी तो हम हैं पर अपने दोष नजर अंदाज कर हमारी फितरत में नहीं ,दोषारोपण हमारी आदत है .मौत सस्ती जो हो गई है .हम नहीं तो हम किसे दोषी मानें ,दोषी आखिर कौन ?
हेलमेट का नियम है ,चार पहिया वाहनों के लिए बेल्ट का प्रावधान है ,गाड़ियों की गति की सीमा भी है पर किसे परवाह है इसकी .मरते हैं हमीं , दुर्घटना ग्रस्त होते हैं हमी फ़िर भी लापरवाही ?
ताबड़तोड़ होती सड़क दुर्घटनाएं ,पर हम कोई सबक नहीं लेते .जागते नहीं ,अपने को नियंत्रित नहीं कर पाते . जब दुर्घटनाएं होती हैं ,तब कानूनों को गली दी जाती है ,थानों का घिराव किया जाता है ,अस्पताल तोड़ फोड़ का शिकार होते हैं .हमें अपनी गलती स्वीकार नहीं .बार बार मौत से खेलते हैं पर हममें को सुधार नहीं ।
सिलसिला मनो यूँ ही चलता रहेगा .हम नहीं सुधरेंगे ,हमने ठान रखा है .कानून कायदे शायद बनाये ही जाते हैं तोड़ने के लिए .फ़िर होने दीजिये मौत ,इतना हो हल्ला किसलिए .पुलिस दोषी क्यों ? कानून दोषी क्यों ?
दोषी तो हम हैं पर अपने दोष नजर अंदाज कर हमारी फितरत में नहीं ,दोषारोपण हमारी आदत है .मौत सस्ती जो हो गई है .हम नहीं तो हम किसे दोषी मानें ,दोषी आखिर कौन ?
Sunday, March 1, 2009
शिरीष का पेड़
जब आती ग्रीष्म ऋतु,
धरती ताप से झुलसती ,
पेड़ पौधे तीखे घाम से ,
गरम गरम थपेडों से ,
मुरझाये लगते ।
पात विहीन डालियों संग ,
अपनी व्यथा कहते ।
पशु पक्षी बेबस हो ,
गरमी की मर सहते ।
आकुल व्याकुल जन ,
पानी ,छांव को तरसते ।
फ़िर भी भीषण गरमी में ,
किसी को शान्ति ,शुकून है ।
केशरिया फूलों से लदा ,
खड़ा शिरीष का पेड़ ,
पर वह भी मौन है ।
देखता है धरती की विपदा ,
पेड़ पौधों और मानवों की सजा ,
हाँ ,
वह धीरज बंधाता है ।
एक आस जगाता है ।
कहता ,टलेगा संकट ,
स्थिर ,थोड़े ही रहता है ।
देखो मुझे ,अपना गम दूर करो ।
भविष्य के सुखद सपनो को ,
अपनी आंखों में भरो ।
यह तपन ,यह तड़पन ,
जरूर कम होगी ।
आशा रखो ,
इस भीषण गरमी से ही ,
धरती की प्यास बुझेगी ।
छाएंगे मेघ ,वर्षा होगी ।
तुम्हारी पीड़ा ,वह ,
अपने आँचल में भर लेगी ।
सारा दुःख ,सारा संकट ,
टल जाएगा ।
धरती हरी भरी हो जायेगी ।
फूटेंगे नव अंकुर ,
तपन की पीड़ा ,
वर्षा की बूंदों में ,
घुल जायेगी .
धरती ताप से झुलसती ,
पेड़ पौधे तीखे घाम से ,
गरम गरम थपेडों से ,
मुरझाये लगते ।
पात विहीन डालियों संग ,
अपनी व्यथा कहते ।
पशु पक्षी बेबस हो ,
गरमी की मर सहते ।
आकुल व्याकुल जन ,
पानी ,छांव को तरसते ।
फ़िर भी भीषण गरमी में ,
किसी को शान्ति ,शुकून है ।
केशरिया फूलों से लदा ,
खड़ा शिरीष का पेड़ ,
पर वह भी मौन है ।
देखता है धरती की विपदा ,
पेड़ पौधों और मानवों की सजा ,
हाँ ,
वह धीरज बंधाता है ।
एक आस जगाता है ।
कहता ,टलेगा संकट ,
स्थिर ,थोड़े ही रहता है ।
देखो मुझे ,अपना गम दूर करो ।
भविष्य के सुखद सपनो को ,
अपनी आंखों में भरो ।
यह तपन ,यह तड़पन ,
जरूर कम होगी ।
आशा रखो ,
इस भीषण गरमी से ही ,
धरती की प्यास बुझेगी ।
छाएंगे मेघ ,वर्षा होगी ।
तुम्हारी पीड़ा ,वह ,
अपने आँचल में भर लेगी ।
सारा दुःख ,सारा संकट ,
टल जाएगा ।
धरती हरी भरी हो जायेगी ।
फूटेंगे नव अंकुर ,
तपन की पीड़ा ,
वर्षा की बूंदों में ,
घुल जायेगी .
Monday, February 23, 2009
आदिदेव महादेव
महाशिवरात्रि शिव का प्रगटीकरण इस धरा पर . त्रिदेवों में एक ,देवों ,दानवों में समान रूप से सम्मानित ..देवों पर जब जब संकट आया ,संकट मोचक बने महादेव .उदार ,सरल ह्रदय शिव सहज में प्रसन्न होकर वरदान दे देते ,भलेही बाद में उनपर संकट आया हो .भस्मासुर कथा सर्वविदित है .समुद्र मंथन में निकले हलाहल को अपने गले लगाकर नीलकंठ बन गए ,गंगा का वेग अपने सर रखा जिसके कारण ही गंगा धरती पर आ सकी .अवधूत,वैराग्य धारण किए हुए ,त्याज्य वस्तुओं को स्वीकार कर भोले नाथ बने .क्रोध आया तो तीसरा नेत्र खुला .और कामदेव भस्म .रति पर दया दिखाकर मानव में ही कामदेव को स्थापित कर दिया .ऐसे हैं शिव ।
आदिगुरू शंकराचार्य ने शिव स्तुति पर अनेक पद लिखे .रावण का शिव तांडव स्त्रोत रावण की शिव भक्ति का अनुपम उदाहरण है .
आदिगुरू शंकराचार्य ने शिव स्तुति पर अनेक पद लिखे .रावण का शिव तांडव स्त्रोत रावण की शिव भक्ति का अनुपम उदाहरण है .
Saturday, February 14, 2009
न जाने क्यों ?
कल कार्यालय जाते समय सड़क पर चलते समय एक वाहन को मुड़ते और अपने रास्ते आते देख आगे बढ़ते हुए सहसा ही अस्फुट स्वर में मुंह से गाली निकल गई .ऐसा कई बार हुआ ,यह पहला अवसर नहीं था .विस मुंह से गाली निकलती नहीं है .जाने कहाँ से क्षणिक क्रोध आता है और मुंह से गाली निकल जाती है .सोचता हूँ जिनके मुंह से हमेशा गाली निकलती है ,क्या वे हमेशा क्रोध में रहते होंगे .क्या उनकी मनोस्थिति हमेशा बिगड़ी रहती होगी .जब हमें थोड़ी देर के गुस्से में ही हमारा मन विचलित हो जाता है .
दुःख भी होता है गाली देकर ,शायद अपनी असुरक्षा से घबडाकर हम अपना आपा खो बैठते हैं और यह घटना हो जाती है .जरा जरा सी बात पर गुस्सा कर हम सचमुच ही अपना अहित ही करते हैं .दुःख ,तनाव ,क्रोध को जन्म देकर हम सुखद क्षणों को खो देते हैं .जीवन की खुशियों को व्यर्थ ही गँवा देते हैं .घर ,परिवार ,दपतर,में व्यर्थ की उलझनें पैदा कर दुखों का पिटारा तैयार कर लेते हैं .छोटी छोटी बातों को लेकर ,अपने अहम् की तुष्टि के लिए पूरा वातावरण ग़मगीन बना देते हैं .आपसी विश्वास खो देते हैं .चंद इस तरह के लोग जिमेद्दार होते हैं इस तरह की घटनाओं के लिए .अपने को मसीहा मान कर अपने को पुजवाने के फेर में दूषित वातारण को जन्म देते हैं .ख़ुद परेशानियों से घिरे शायद दूसरो को परेशान देख खुश होते हैं ।
आखिर इन्हें क्या आनंद मिलता है .स्वयं उलझ कर दूसरों को भी उलझाते हैं ,न जाने क्यों ?
दुःख भी होता है गाली देकर ,शायद अपनी असुरक्षा से घबडाकर हम अपना आपा खो बैठते हैं और यह घटना हो जाती है .जरा जरा सी बात पर गुस्सा कर हम सचमुच ही अपना अहित ही करते हैं .दुःख ,तनाव ,क्रोध को जन्म देकर हम सुखद क्षणों को खो देते हैं .जीवन की खुशियों को व्यर्थ ही गँवा देते हैं .घर ,परिवार ,दपतर,में व्यर्थ की उलझनें पैदा कर दुखों का पिटारा तैयार कर लेते हैं .छोटी छोटी बातों को लेकर ,अपने अहम् की तुष्टि के लिए पूरा वातावरण ग़मगीन बना देते हैं .आपसी विश्वास खो देते हैं .चंद इस तरह के लोग जिमेद्दार होते हैं इस तरह की घटनाओं के लिए .अपने को मसीहा मान कर अपने को पुजवाने के फेर में दूषित वातारण को जन्म देते हैं .ख़ुद परेशानियों से घिरे शायद दूसरो को परेशान देख खुश होते हैं ।
आखिर इन्हें क्या आनंद मिलता है .स्वयं उलझ कर दूसरों को भी उलझाते हैं ,न जाने क्यों ?
Wednesday, February 11, 2009
समाज के कोढ़
पत्नी ,चार बेटियाँ और तीन बेटों के साथ वह अपना जीवन यापन कर रहा था .स्वयं दिन में सत्तर ,अस्सी रूपये की मजदूरी और बड़े बेटे के द्वारा किए गए काम के एवज में रोज के कुछ रुपये ,यही आय का साधन था ।
खींचता रहा किसी तरह वह अपने परिवार की गाडी .मंहगाई के इस दौर में उसकी परिवार गाथा अद्भुत और दुखदाई है .परिवार का बोझ ढोना उसे भरी पड़ रहा था .तभी तो एक दिन वह अपनी पत्नी ,चारों बेटियों को जहर देता है ,हाँ बेटों को वह बख्श देता है ,जाने क्यों .जहर का असर न होते देख चाकू की मदद से उनका गला रेतता है वह और स्वयं पर भी चाकू का वार करता है आत्महत्या के लिए ।
दुखद घटना में दो बेटियाँ वहीं मर जाती हैं ,बाकी परिजन और वह स्वयं अस्पताल में दाखिल होते हैं .पत्नी का भी इंतकाल हो जाता है वह और दो बेटियाँ जीवन से संघर्ष कर अभी जिन्दा हैं ।
शफीक नाम है उसका जिसने यह भीषण और अमानुषिक कार्य किया .यह वीभत्स घटना भोपाल की है .बयान लिए जाने हैं शफीक के ,आत्म हत्या व हत्या का अपराधी तो वह है ही .वैसे शासन की तरफ़ से उसके परिवार को आर्थिक मदद दी गयी है ।
अशिक्षा ,गरीबी व बड़े परिवार ने एक और परिवार को बर्बाद कर दिया .उन बच्चों का क्या दोष .अपनी गलतियों से उन निर्दोषं जनों की बलि क्यों चाहता था वह ? बेटों को क्या सोच कर उसने बख्श दिया ?
इस तरह की दुखद घटनाएँ क्या समाज को आयना अभी भी नहीं दिखातीं .कब तक यह सब होता रहेगा ?हमारा आर्थिक विकास ,हमारी उन्नति के क्या मायने हैं जब मात्र गुजर बसर न कर पाने के कारण परिवार तबाह हो जाता है .यह इस तरह की घटनाओं की मात्र पुनरावृत्ति है ।
क्या समाज अब भी चेतेगा याकि अशिक्षा ,गरीबी और बड़ा परिवार समाज का कोढ़ ही साबित होती रहेगी ।
समाज की चुप्पी खल रही है .घटना हो जाने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं .आख़िर कब तक यह सब ?
खींचता रहा किसी तरह वह अपने परिवार की गाडी .मंहगाई के इस दौर में उसकी परिवार गाथा अद्भुत और दुखदाई है .परिवार का बोझ ढोना उसे भरी पड़ रहा था .तभी तो एक दिन वह अपनी पत्नी ,चारों बेटियों को जहर देता है ,हाँ बेटों को वह बख्श देता है ,जाने क्यों .जहर का असर न होते देख चाकू की मदद से उनका गला रेतता है वह और स्वयं पर भी चाकू का वार करता है आत्महत्या के लिए ।
दुखद घटना में दो बेटियाँ वहीं मर जाती हैं ,बाकी परिजन और वह स्वयं अस्पताल में दाखिल होते हैं .पत्नी का भी इंतकाल हो जाता है वह और दो बेटियाँ जीवन से संघर्ष कर अभी जिन्दा हैं ।
शफीक नाम है उसका जिसने यह भीषण और अमानुषिक कार्य किया .यह वीभत्स घटना भोपाल की है .बयान लिए जाने हैं शफीक के ,आत्म हत्या व हत्या का अपराधी तो वह है ही .वैसे शासन की तरफ़ से उसके परिवार को आर्थिक मदद दी गयी है ।
अशिक्षा ,गरीबी व बड़े परिवार ने एक और परिवार को बर्बाद कर दिया .उन बच्चों का क्या दोष .अपनी गलतियों से उन निर्दोषं जनों की बलि क्यों चाहता था वह ? बेटों को क्या सोच कर उसने बख्श दिया ?
इस तरह की दुखद घटनाएँ क्या समाज को आयना अभी भी नहीं दिखातीं .कब तक यह सब होता रहेगा ?हमारा आर्थिक विकास ,हमारी उन्नति के क्या मायने हैं जब मात्र गुजर बसर न कर पाने के कारण परिवार तबाह हो जाता है .यह इस तरह की घटनाओं की मात्र पुनरावृत्ति है ।
क्या समाज अब भी चेतेगा याकि अशिक्षा ,गरीबी और बड़ा परिवार समाज का कोढ़ ही साबित होती रहेगी ।
समाज की चुप्पी खल रही है .घटना हो जाने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं .आख़िर कब तक यह सब ?
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