Tuesday, November 25, 2008

" निराला "की वह

निराला की वह -
आज भी तोड़ती पत्थर ,
इलाहाबाद के पथ पर ही नहीं ,
सारे भारत भू पर।
फोर लेन,सिक्स लेन -
सड़कों का काम हो ,या ,
गगन चुम्बी भवनों का निर्माण हो ।
सब में तलाशती वह अपनी भूमिका ।
मनो ,विकास के नक्शे पर चलाती तूलिका ।
चलती वह पाँव पाँव ,
टूटी ,फूटी झोपड़ी उसकी छाँव ।
बस ,ढूनती वह काम -
अपने गुजारेके लिए ,
अलमस्त ,सुबह से शाम तक ,
पत्थरों पर हथौड़े चलाती,लक
ईंट,गारा सर रखती ,
चलती जाती बेफिक्र हो ,
जीवन की रफ़्तार के संग ।
प्रगति की राह सड़कों पर ।
विकास के नक्शे भवनों में बनते ,
दुनिया आज और बड़ी होती ।
लेकिन बेफिक्र वह -
उसकी चिंता तो आज भी
रोटी होती ।
हाँ ,वह नींव का वह पत्थर है ।
गाँव ,शहर जिस पर निर्भर है .
आख़िर है तो नींव ही ,
ढँक दी जायेगी ।
प्रगति और विकास का श्रेय ,
किसी और को दे जायेगी ।
किसी और को दे जायेगी .

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