Wednesday, February 11, 2009

समाज के कोढ़

पत्नी ,चार बेटियाँ और तीन बेटों के साथ वह अपना जीवन यापन कर रहा था .स्वयं दिन में सत्तर ,अस्सी रूपये की मजदूरी और बड़े बेटे के द्वारा किए गए काम के एवज में रोज के कुछ रुपये ,यही आय का साधन था ।
खींचता रहा किसी तरह वह अपने परिवार की गाडी .मंहगाई के इस दौर में उसकी परिवार गाथा अद्भुत और दुखदाई है .परिवार का बोझ ढोना उसे भरी पड़ रहा था .तभी तो एक दिन वह अपनी पत्नी ,चारों बेटियों को जहर देता है ,हाँ बेटों को वह बख्श देता है ,जाने क्यों .जहर का असर न होते देख चाकू की मदद से उनका गला रेतता है वह और स्वयं पर भी चाकू का वार करता है आत्महत्या के लिए ।
दुखद घटना में दो बेटियाँ वहीं मर जाती हैं ,बाकी परिजन और वह स्वयं अस्पताल में दाखिल होते हैं .पत्नी का भी इंतकाल हो जाता है वह और दो बेटियाँ जीवन से संघर्ष कर अभी जिन्दा हैं ।
शफीक नाम है उसका जिसने यह भीषण और अमानुषिक कार्य किया .यह वीभत्स घटना भोपाल की है .बयान लिए जाने हैं शफीक के ,आत्म हत्या व हत्या का अपराधी तो वह है ही .वैसे शासन की तरफ़ से उसके परिवार को आर्थिक मदद दी गयी है ।
अशिक्षा ,गरीबी व बड़े परिवार ने एक और परिवार को बर्बाद कर दिया .उन बच्चों का क्या दोष .अपनी गलतियों से उन निर्दोषं जनों की बलि क्यों चाहता था वह ? बेटों को क्या सोच कर उसने बख्श दिया ?
इस तरह की दुखद घटनाएँ क्या समाज को आयना अभी भी नहीं दिखातीं .कब तक यह सब होता रहेगा ?हमारा आर्थिक विकास ,हमारी उन्नति के क्या मायने हैं जब मात्र गुजर बसर न कर पाने के कारण परिवार तबाह हो जाता है .यह इस तरह की घटनाओं की मात्र पुनरावृत्ति है ।
क्या समाज अब भी चेतेगा याकि अशिक्षा ,गरीबी और बड़ा परिवार समाज का कोढ़ ही साबित होती रहेगी ।
समाज की चुप्पी खल रही है .घटना हो जाने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं .आख़िर कब तक यह सब ?

1 comment:

ab inconvinienti said...

बेटों को क्या सोच कर उसने बख्श दिया ?

शायद आप नहीं जानते की दुनिया में बिना माँ बाप की लड़कियों का क्या हाल होता है, उस बाप की सोच यही रही होगी की लड़के बड़े न सही पर कैसे भी अपने बूते पर जिंदा रह ही लेंगे. पर बच्चियों को अगर अनाथ जीना पड़ा तो यह दुनिया न जाने उनका क्या हाल करे.

आपका सोचना शायद यह है की उसने लड़कियों को बोझ समझने या भेदभाव की मानसिकता के चलते लड़कियों को मारा.

पर कहानी इतनी ही नहीं है, लड़के जिन्होंने अभी होश ही नहीं संभाला उनसे बहनों की ज़िम्मेदारी उठाने की उम्मीद करना बेमानी था. और बाकि दुनिया भरोसे लायक नहीं है, खासकर अनाथ लड़कियों के लिए. यहाँ जब बाप के रहते लड़कियां उठा ली जाती हैं, तो घर में किसी बड़े के बिना.............

ज़िन्दगी को करीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हे रुला देगा